Beautiful Poems On WhatsApp October Series

“उलझने हैं बहुत…
सुलझा लिया करता हूँ ,
फोटो खिंचवाते वक़्त मैं अक्सर…
मुस्कुरा लिया करता हूँ “
क्यूँ नुमाइश करूँ मैं अपने माथे पर शिकन की,
मैं अक्सर मुस्कुरा के इन्हें..
मिटा दिया करता हूँ..”
क्यूंकि..
“जब लड़ना है खुद को खुद ही से
हार-जीत में इसलिए कोई फ़र्क नहीं रखता हूँ 
हारूं या जीतूं कोई रंज नहीं
कभी खुद को जिता देताहूँ
कभी खुद से जीत जाता हूँ…..!!”

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गरीब हूँ मगर ख़ुश बहुत हूँ,
क्योंकि दिल के अमीर दोस्तों के साथ रहता हूँ,
उस चाँद को बहुत गुरूर है
कि उसके पास नूर है…..
मगर वो क्या जाने की
मेरा तो पूरा ग्रुप ही कोहिनूर है
☺☺☺
? हमारा ग्रुप बहुत सुंदर है
       इसे और सुंदर बनाओ।
मन ऐसा रखो कि
         किसी को बुरा न लगे।
दिल ऐसा रखो कि
       किसी को दुःखी न करे।
रिश्ता ऐसा रखो कि
              उसका अंत न हो।
  हमने रिश्तों को संभाला है
        मोतियों की तरह
     कोई गिर भी जाए तो
     झुक के उठा लेते हें ॥
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इस जीवन की चादर में,
सांसों के ताने बाने हैं,
दुख की थोड़ी सी सलवट है,
सुख के कुछ फूल सुहाने हैं.
क्यों सोचे आगे क्या होगा,
अब कल के कौन ठिकाने हैं,
ऊपर बैठा वो बाजीगर ,
जाने क्या मन में ठाने है.
चाहे जितना भी जतन करे,
भरने का दामन तारों से,
झोली में वो ही आएँगे,
जो तेरे नाम के दाने है…….
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जिन्दगी की दौड़ में,
तजुर्बा कच्चा ही रह गया…
हम सीख न पाये ‘फरेब’
और दिल बच्चा ही रह गया !
बचपन में जहां चाहा हंस लेते थे,
जहां चाहा रो लेते थे…
पर अब मुस्कान को तमीज़ चाहिए
और आंसुओ को तन्हाई !
हम भी मुस्कराते थे कभी बेपरवाह अन्दाज़ से…
देखा है आज खुद को कुछ पुरानी तस्वीरों में !
चलो मुस्कुराने की वजह ढूंढते हैं…
जिन्दगी तुम हमें ढूंढो…
हम तुम्हे ढूंढते हैं …!!!
Beautiful Poems On WhatsApp October Series
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